आरती · भगवान विष्णु
ॐ जय जगदीश हरे
पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी रचित सर्वाधिक प्रचलित आरती — हर पूजा के अंत में गाई जाती है।
🗓 प्रतिदिन, गुरुवार, एकादशी, सत्यनारायण कथा
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ॐ जय जगदीश हरे॥
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का, स्वामी दुःख बिनसे मन का।सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी, स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी।तुम बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी॥
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी।पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता।मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, स्वामी सबके प्राणपति।किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥
दीन-बन्धु दुःख-हर्ता, ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे।अपने हाथ उठाओ, अपने शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वामी पाप हरो देवा।श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥ॐ जय जगदीश हरे॥