शाक्त – परम्परा में कुमारिका पूजन की शास्त्रीय अवधारणा
भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान परम्परा में शक्ति-उपासना उस सनातन तत्त्वदृष्टि पर प्रतिष्ठित है, जिसके अनुसार सम्पूर्ण चराचर जगत् पराशक्ति की अभिव्यक्ति है। वह एकमेव आद्याशक्ति ही सृष्टि में प्रकृति, चेतना में विद्या, प्राणियों में जीवनशक्ति, मातृत्व में सृजनशक्ति और साधक के अन्तःकरण में कुण्डलिनी-चैतन्य के रूप में विविध प्रकार से अवभासित होती है। इसी सर्वव्यापिनी शक्ति के सजीव, सौम्य एवं निर्मल स्वरूप का अनुष्ठानिक आविष्कार है—कुमारिका-पूजन।
कुमारिका-पूजन को यदि केवल नवरात्रि में प्रचलित एक लौकिकाचार मान लिया जाए, तो उसके अन्तर्निहित शाक्त-तत्त्व का पर्याप्त बोध नहीं हो पाता। वस्तुतः यह उपासना देवी-तत्त्व की सर्वभूतान्तरवर्तिता, शक्ति की चेतनस्वरूपता तथा स्त्री-तत्त्व की दिव्यता को प्रत्यक्ष भावभूमि प्रदान करती है।
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आद्याशक्ति का सर्वभूतान्तरवर्ती स्वरूप
देवीमाहात्म्य में भगवती के सर्वव्यापक स्वरूप का अत्यन्त गम्भीर निरूपण प्राप्त होता है—
देवी किसी एक देश, काल अथवा विग्रह में परिमित सत्ता नहीं हैं; वे सर्वभूतान्तरात्मभूता शक्ति हैं।
अतः शाक्त साधना में देवी का पूजन केवल प्रतिमा के सम्मुख सम्पन्न होने वाली क्रिया नहीं है। काशी के विंध्य क्षेत्र में निवास करने वाली माँ विंध्यवासिनी देवी श्रीकृष्णयोगमाया ही हैं। पांच हजार वर्ष पूर्व जन्मी योगमाया आताताई कंस के हाथ से छूट कर आकाशवाणी करती हुई विंध्य पर्वत शृंखला पर विराजमान हो गई । ( देखा जाए तो यह योगमाया कन्या भ्रूण हत्या की प्रतीक देवी के रूप में पूजित है )
शाक्त उपासना में देवी को प्रसन्न करने का दो सबसे सरल , सहज मार्ग बताया गया है । पहला अर्चन- देवी को शीघ्र प्रसन्न करने का सबसे सरल मार्ग अर्चन ही है । दूसरा कुमारिका पूजन – जो कि सबसे सर्वोत्तम मार्ग बताया गया है । देवराज इंद्र ने ब्रह्मा जी से देवी को प्रसन्न करने का मार्ग पूछा तो ब्रह्मा जी द्वारा कन्या पूजन को सबसे सर्वोत्तम मार्ग बताया । ब्रह्मा जी ने बताया कि शाक्त उपासना में जितना महत्व जप , पाठ एवं होम आदि का है उससे कही ज्यादा शास्त्रीय महत्व कुमारी पूजन को दिया गया है । यहाँ तक कि देवी ने स्वयं इस बात की पुष्टि की है कि कलियुग में शक्ति आराधना के अलावा मानव जन के कल्याणार्थ दूसरा कोई विकल्प नहीं है।
कुमारिका-पूजन इसी तत्त्वदृष्टि का विशिष्ट उपासना-विधान है।
कुमारिका : पराशक्ति का निर्मल आविर्भाव है । जो कि इस संसार की प्रत्येक कन्या में विद्यमान है ।
यहाँ एक सूक्ष्म भेद सर्वदा स्मरणीय है—
कुमारिका-पूजन किसी लौकिक व्यक्ति की देह की उपासना नहीं, अपितु उसके माध्यम से देवी के कुमारिका-स्वरूप का भावपूर्वक अर्चन है।
अर्थात् पूज्या देह नहीं अपितु देह में भावित देवी का चैतन्य स्वरूप है।
यही चैतन्यभाव कुमारिका-पूजन को सामान्य सत्कार से पृथक् करके शाक्तोपासना का अंग बनाता है।
देवी और शक्ति : अभिन्न तत्त्व
शाक्त दर्शन में ‘देवी’ और ‘शक्ति’ को मूलतः पृथक् सत्ता के रूप में नहीं देखा जाता। शक्ति ही देवी है और देवी ही शक्ति।
सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय जिन शक्तियों के द्वारा सम्पन्न होते हैं, वे उसी पराशक्ति के विविध आविर्भाव हैं। अतः देवी की उपासना अन्ततः शक्ति-तत्त्व की उपासना है।
इसी परिप्रेक्ष्य में कुमारिका में भगवती का पूजन वस्तुतः यह स्वीकार करना है कि—
सृष्टि की मूल सृजनशक्ति जिस पराशक्ति में प्रतिष्ठित है, उसी का सूक्ष्म, सौम्य एवं कुमारिका-स्वरूप इस जीवित अधिष्ठान में भावित किया जा सकता है।
कुमारिका-पूजन में भाव के साथ साथ श्रद्धा का बड़ा महत्त्व बताया गया है ।
शाक्त साधना का प्राण केवल मन्त्र, तन्त्र और कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि भावना है।
बाह्योपचार—गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, अर्घ्य आदि—साधना के दृश्य अंग हैं; किन्तु उनके पीछे प्रतिष्ठित देवी-भावना ही उन्हें उपासना का स्वरूप प्रदान करती है।
अतः कुमारिका के चरणों में पुष्प अर्पित करते समय साधक का अन्तर्भाव यह होना चाहिए कि—
“या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता, सा एव भगवती अस्याः कुमारिकायाः स्वरूपेण मया भाव्यते।”
इस भाव में साधक की दृष्टि लौकिक से अलौकिकता की ओर, व्यक्त से अव्यक्त की ओर और दृश्य से तत्त्व की ओर उन्मुख होती है।
कुमारिका-पूजन का आध्यात्मिक चैतन्य भाव देवी के जीवित अधिष्ठान का अर्चन
भारतीय उपासना-पद्धति में अधिष्ठान की संकल्पना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। साधक किसी प्रतीक, प्रतिमा अथवा पात्र में उपास्य-तत्त्व का आवाहन करके उसके माध्यम से आराधना करता है।
कुमारिका-पूजन में यही अधिष्ठान-भाव जीवित चेतना के माध्यम से अभिव्यक्त होता है।
इसलिए कुमारिका-पूजन का तात्त्विक आशय यह नहीं कि एक बालिका को लौकिक अर्थ में देवी घोषित कर दिया गया; अपितु यह कि साधक देवी के कुमारिका-भाव का आवाहन, ध्यान और अर्चन उस जीवित अधिष्ठान में करता है।
यह शाक्त उपासना की उस विशिष्ट दृष्टि को प्रकट करता है जिसमें चैतन्य स्वयं उपासना का केन्द्र बन जाता है।
नवरात्रि और कुमारिका-तत्त्व
नवरात्रि शाक्त साधना का विशिष्ट पर्व है। इसमें भगवती के विविध रूपों का आवाहन, पूजन, जप, होम, उपवास और ध्यान सम्पन्न किया जाता है।देवीपुराण ,देवीभागवत एवं अन्य तांत्रोक्त ग्रंथों के शास्त्रीय वचन कन्या पूजन में 2 (दो )वर्ष की कन्या से लेकर 10 ( दस)तक की कन्या जो ऋतु धर्म युक्त न हो उसे कुमारिका के रूप में स्वीकार करते हुए देवी के रूप में प्रतिष्ठित किए है ।
कुमारिका’ केवल आयु-विशेष का द्योतक शब्द नहीं है !शाक्त उपासना में यह देवी के अविकसित, निर्मल, अनाघ्रात एवं सम्भावनामय शक्ति-स्वरूप का द्योतक बन जाता है।
कुमारिका में अभी संसारगत संस्कारों की जटिलता अपेक्षया अल्प होती है। अतः उसमें निष्कलुषता, सहजता, प्रसन्नता और अप्रकट सृजन-सामर्थ्य का भाव आरोपित किया जाता है।
यही कारण है कि शाक्त साधना में कुमारिका को भगवती के एक विशिष्ट भावस्वरूप के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। नवरात्र के नौ भेद से कुल नौ कन्याओं को देवी के रूप में पूजित करने की परम्परा प्राप्त होती है
कुमारिका-पूजन इसी साधना-परम्परा में देवी के बाल्य एवं कुमारिका-भाव को प्रतिष्ठित करता है।
विभिन्न शाक्त, आगमिक एवं तान्त्रिक परम्पराओं में कुमारिका की संख्या, आयु और नाम-निर्देश में भेद उपलब्ध होते हैं। अतः किसी एक लोकप्रचलित नवकन्या-सूची को सम्पूर्ण शाक्त परम्परा का सार्वत्रिक एवं एकमात्र विधान मानना शास्त्रीय दृष्टि से उचित नहीं होगा।
किन्तु इन विभिन्न विधानों के अन्तःस्थ तत्त्व में एक साम्य है—
कुमारिका में भगवती के विशिष्ट शक्ति-स्वरूप का भावपूर्वक अर्चन करना !!
कुमारिका और नवशक्ति का भाव
कुमारिका-पूजन के विविध विधानों में कन्याओं को देवी के विभिन्न नामों एवं शक्ति-स्वरूपों से सम्बद्ध किया जाता है। यह क्रम वस्तुतः एकैव पराशक्ति के अनेक शक्ति-प्रकाशों का प्रतीक है।
नौ कुमारिका के नाम और उनके अभीष्ट फल
2 वर्ष – कुमारी – दरिद्रता को नष्ट करती है ।
3 वर्ष – त्रिपुरा – कल्याणकारिणी है ।
4 वर्ष – कल्याणी – सुख प्रदान करने वाली
5 वर्ष – रोहिणी – रोगों का हरण करने वाली ।
6 वर्ष – कामिनी – राज्यपद को देने वाली !
7 वर्ष – चण्डिका – ऐश्वर्य प्रदान करने वाली ।
8 वर्ष – शाम्भवी – जय दिलाने वाली
9 वर्ष – दुर्गा – अभीष्ट फल को प्रदान करने वाली ।
10 वर्ष – सुभद्रा – परलोक / मोक्ष को देने वाली ।
इस प्रकार हम कन्या को देवी के रूप में पूजित कर मानव अपने अभीष्ट की पूर्णता करता चला आ रहा है । साथ ही यह नौ कन्याओं का पूजन एकत्व भाव को भी प्रदर्शित करता है जहां नाम ,आयु और फल में परिवर्तन होते हुए भी सब एक भाव में निहित है ।
शाक्त दर्शन का वैशिष्ट्य ही यह है कि वह अनेकता में एकत्व और एकत्व में अनेकता का दर्शन करता है।
अतः दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती, चण्डिका, अम्बिका अथवा कुमारिका—ये परस्पर विरोधी देवताएँ नहीं, बल्कि एकस्याः पराशक्तेः विभिन्न भावाभिव्यक्तयः हैं।
कुमारिका-पूजन इसी बहुरूपिणी शक्ति के एक अत्यन्त कोमल और निर्मल आविर्भाव का अर्चन है।
कुमारीका चरणार्चन और आत्मसमर्पण
कुमारिका के चरणों का प्रक्षालन एवं पूजन भी केवल परम्परागत उपचार नहीं है। भारतीय साधना-परम्परा में चरण आश्रय, गति, शरणागति और साधना-पथ के प्रतीक हैं।
साधक जब कुमारिका के चरणों में प्रणति करता है, तब बाह्य रूप से वह देवी के कुमारिका-स्वरूप के सम्मुख नतमस्तक होता है; किन्तु आध्यात्मिक रूप से वह अपने अहंकार, कर्तृत्वाभिमान और स्वातन्त्र्याभिमान को आद्याशक्ति के चरणों में समर्पित करने का संस्कार करता है।
अतः कुमारिका-पूजन का परम फल केवल पुण्य-संचय नहीं, बल्कि शक्ति के प्रति आत्मसमर्पण की भावना का संस्कार है।
कुमारिका-पूजन और शाक्त साधना का अन्तर्भाव
कुमारिका-पूजन के अन्तर्भाव को तीन सोपानों में समझा जा सकता है
प्रथम -देवी दर्शन
कुमारिका में भगवती के कुमारिका-स्वरूप का दर्शन।
द्वितीय—शक्ति-दर्शन
यह अनुभूति कि वही शक्ति समस्त प्राणियों में विभिन्न रूपों से प्रतिष्ठित है।
तृतीय—शक्ति ऐक्य भाव साधना
साधक अपने भीतर स्थित चेतना, प्राण और कुण्डलिनी को उसी आद्याशक्ति की अभिव्यक्ति के रूप में अनुभव करने का प्रयत्न करता है।
इस प्रकार कुमारिका-पूजन केवल बाह्य अर्चन पर समाप्त नहीं होता; वह साधक को बहिर्मुखी देवताराधना से अन्तर्मुखी शक्तिसाधना की ओर उन्मुख करता है।
कन्या-सम्मान – शाक्त भाव का लौकिक विस्तार
शास्त्रीय उपासना का मूल्य उसके बाह्याचार के साथ-साथ उसके द्वारा उत्पन्न होने वाले संस्कार से भी निर्धारित होता है।
यदि कुमारिका में देवी का दर्शन किया गया है, तो उसके प्रति अवमानना, हिंसा, उपेक्षा अथवा अन्याय शाक्त भाव के विपरीत आचरण होगा।
अतः आधुनिक सामाजिक सन्दर्भ में कुमारिका-पूजन का स्वाभाविक विस्तार है—कन्या के प्रति गौरव, संरक्षण, शिक्षा, स्वावलम्बन और सम्मान की भावना।
यहाँ सामाजिक आदर्श को शास्त्रीय विधान का प्रत्यक्ष पर्याय नहीं, बल्कि शाक्त तत्त्वदृष्टि का समकालीन नैतिक विस्तार समझना अधिक उपयुक्त होना चाहिए ।
उपासना से अनुभूति तक
शाक्त साधना का लक्ष्य केवल देवी के नाम का उच्चारण या उपचारों का सम्पादन नहीं, बल्कि देवी-चैतन्य की अनुभूति है।
कुमारिका-पूजन में साधक बाह्य रूप से एक कुमारिका का अर्चन करता है; किन्तु अन्तःकरण में उसे उस पराशक्ति का साक्षात्कार करने की साधना करनी होती है जो—
प्राण में जीवनशक्ति है,
बुद्धि में प्रज्ञाशक्ति है,
हृदय में करुणाशक्ति है,
प्रकृति में सृजनशक्ति है,
और साधक के अन्तःकरण में आत्मजागरण की शक्ति है।
इस प्रकार कुमारिका-पूजन देवी को बाहर खोजने से देवी को सर्वत्र अनुभव करने की यात्रा का एक सूक्ष्म साधन बन जाता है।
कुमारिका-पूजन शाक्त परम्परा की उस महान् तत्त्वदृष्टि का अनुष्ठानिक रूप है जिसमें पराशक्ति को सर्वभूतान्तरवर्तिनी, सर्वजीवप्राणशक्ति तथा जगज्जननी के रूप में अनुभूत किया जाता है।
कुमारिका में देवी का दर्शन,
देवी में समस्त शक्ति का दर्शन,
और समस्त शक्ति में उसी एक पराशक्ति का अनुभव—
यही इस साधना की अन्तर्धारा है।
अतः कुमारिका-पूजन का चरम रहस्य बाह्य उपचारों में नहीं, दृष्टि के संस्कार में निहित है।
जहाँ साधक कुमारिका में केवल बालिका न देखकर भगवती के कुमारिका-स्वरूप का दर्शन करता है, वहीं से शाक्त उपासना का वास्तविक अन्तर्भाव प्रारम्भ होता है।
और जहाँ वही देवी-दृष्टि समस्त चराचर में प्रसारित हो जाती है, वहाँ उपासना कर्मकाण्ड की सीमा का अतिक्रमण करके शक्ति-चैतन्य की अनुभूति की साधना बन जाती है।
“कुमारिकायां भगवतीभावः,
भगवत्यां विश्वशक्तिभावः,
विश्वशक्तौ आत्मभावः—
एषा एव शाक्तोपासनायाः क्रमोन्नतिः।”
आचार्य विवेक उपाध्याय
निदेशक – माँ कामाख्या ज्योतिष पीठम् (ट्रस्ट) , साधक माँ कामाख्या शक्ति पीठ , गुवाहाटी (असम)
जय माँ कामाख्या 🙏💐