जीवन की तलाश है शक्ति पूजा

 

 

भारतीय संस्कृति में शक्ति आराधना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन और प्रकृति के बीच गहरे संबंध का उत्सव है। वासंतिक नवरात्र का आगमन उस समय होता है जब प्रकृति नवजीवन से भर उठती है और नवसंवत्सर की शुरुआत होती है। यह समय हमें याद दिलाता है कि सृष्टि की मूल ऊर्जा शक्ति ही है और उसी की साधना से जीवन में संतुलन, मर्यादा और आनंद की प्राप्ति होती है।

 

 

प्रकृति और शक्ति का उत्सव है
भारतीय संस्कृति की इतनी विशुद्ध परंपरा शायद ही कहीं और देखने को मिले। यहां वर्ष का प्रारंभ ही शक्ति आराधना के साथ होता है। वासंतिक नवरात्र हमें केवल देवी की पूजा करने का संदेश नहीं देता, बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने की प्रेरणा भी देता है। यह पर्व शीत और ग्रीष्म ऋतु के संधिकाल में आता है। इसी समय प्रकृति में नई ऊर्जा का संचार होता है। पेड़-पौधों में नई कोंपलें फूटती हैं, वातावरण में उल्लास और सृजन की भावना जागृत होती है। यही कारण है कि वासंतिक नवरात्र को प्रकृति का सहचर भी कहा जाता है। इस काल में शक्ति की आराधना करते हुए मनुष्य प्रकृति की उसी सृजनात्मक ऊर्जा को अपने भीतर अनुभव करने का प्रयास करता है।

 

 

नवसंवत्सर और राम जन्म का दिव्य संयोग
वासंतिक नवरात्र केवल देवी पूजा का पर्व ही नहीं है, बल्कि यह नवसंवत्सर के आगमन का भी प्रतीक है। इसी अवधि में चैत्र शुक्ल नवमी को भगवान राम का जन्मोत्सव भी मनाया जाता है। एक ओर शक्ति की आराधना और दूसरी ओर मर्यादा पुरुषोत्तम राम का स्मरण, यह भारतीय संस्कृति का अद्भुत संतुलन है। शक्ति ऊर्जा का प्रतीक है, जबकि राम मर्यादा और धर्म के आदर्श हैं। बसंत ऋतु में प्रकृति में सृजन और इच्छा शक्ति जागृत होती है। ऐसे समय में भगवान राम की पूजा यह संदेश देती है कि शक्ति का उपयोग मर्यादा और संयम के साथ होना चाहिए। यही जीवन को संतुलित और सार्थक बनाता है।

 

 

ब्रह्मांड की मूल ऊर्जा है शक्ति
भारतीय दर्शन के अनुसार संपूर्ण ब्रह्मांड शक्ति की आनंदमयी सृष्टि है। शिव और शक्ति का संबंध इसी सत्य को व्यक्त करता है। परमशिव में जो स्पंदन है, वही शक्ति है। जब शिव और शक्ति का मिलन होता है तो वह अर्धनारीश्वर का रूप धारण करता है। यह रूप बताता है कि सृष्टि में स्त्री और पुरुष ऊर्जा का संतुलन ही जीवन का आधार है। दुर्गासप्तशती में भगवती कहती हैं-
‘एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा।’ अर्थात इस जगत में एकमात्र शक्ति ही विद्यमान है और उससे अलग कुछ भी नहीं। सृष्टि में दिखाई देने वाली विविधता उसी शक्ति की लीला है। इसलिए शाक्त परंपरा में परमशक्ति को माता के रूप में पूजते हैं और मातृभाव से उसकी उपासना करते हैं।

 

 

शक्ति साधना के तीन मार्ग
शास्त्रों में शक्ति उपासना के तीन प्रमुख भाव बताए गए हैं पशुभाव, वीरभाव और दिव्यभाव। पशुभाव में साधक नियम और पवित्रता की मर्यादा में रहकर साधना करता है। इसमें वेदाचार, वैष्णवाचार और शैवाचार की परंपराएं शामिल हैं। वीरभाव में साधक साहस और संयम के साथ साधना के उच्च स्तर की ओर बढ़ता है। इसमें दक्षिणाचार, सिद्धांताचार और वामाचार की परंपराएं आती हैं। दिव्यभाव सबसे उच्च अवस्था मानी जाती है। इसमें साधक अपने मन और चित्त को शुद्ध कर प्रत्येक स्त्री में मातृभाव का दर्शन करने लगता है। इन सभी मार्गों का उद्देश्य एक ही है, परमशक्ति के साथ आत्मिक एकत्व प्राप्त करना।

 

 

सहज भक्ति का मार्ग
शक्ति साधना में एक मार्ग और भी बताया गया है सहजाचार। इसमें जटिल नियमों से अधिक महत्व सरलता और प्रेम का होता है। राजस्थान के देशनोक स्थित करणी माता के संदर्भ में एक दृष्टांत प्रसिद्ध है कि माता ने चारण वंश में जन्म लेकर सहज भक्ति का संदेश दिया। चारण समुदाय गौसेवा और प्रकृति से जुड़े जीवन के लिए जाना जाता रहा है। उनकी सरल जीवन शैली और देवी के प्रति अटूट श्रद्धा ने उन्हें मातृशक्ति के विशेष भक्त के रूप में प्रतिष्ठित किया। सहजाचार का अर्थ है निर्मल हृदय से मां को स्मरण करना और उसके प्रति समर्पण भाव रखना।

 

 

निष्काम भक्ति से आनंदमयी शक्ति
शक्ति उपासना का परम लक्ष्य मां के सान्निध्य का अनुभव करना है। इसके लिए आवश्यक है कि भक्ति निष्काम हो। यदि उपासना केवल इच्छाओं की पूर्ति के लिए की जाती है तो वह सीमित रह जाती है। यह स्थिति उस बालक के समान है जिसे रोते देखकर मां खिलौना दे देती है। लेकिन जब वही बालक खिलौना छोड़कर केवल मां को पुकारता है, तब मां सब काम छोड़कर उसके पास आ जाती है। इसी प्रकार जब भक्त सांसारिक इच्छाओं को छोड़कर केवल मां के प्रेम में समर्पित हो जाता है, तब उसे सच्चे आनंद का अनुभव होता है। यही शक्ति उपासना का वास्तविक सार है। नवरात्र का यह पर्व हमें यह संदेश देता है कि जीवन की वास्तविक खोज बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि अपने भीतर की शक्ति को पहचानने में है। जब हम सरल और निष्काम भाव से शक्ति की आराधना करते हैं, तब वही शक्ति हमारे जीवन को प्रकाश और आनंद से भर देती है।

 

 

आचार्य विवेक उपाध्याय, निदेशक-प्रबंधक, मां कामाख्या ज्योतिष पीठम् ट्रस्ट, गुवाहाटी